Monday, July 31, 2017

वो चंद लिफ़ाफ़े

वो चंद लिफ़ाफ़े


वो चंद लिफाफों में आज भी मोहब्बत क़ैद हैं मेरी,
धडकनें आज़ाद न हो जाएँ, ख़त खोलने से डर लगता है
जिन मासूम खतों में, बाबस्ता झूठ लिखा था तूने,
उस झूठ को भी आज-कल, झूठ बोलने से डर लगता है.
धडकनें आज़ाद न हो जाएँ, ख़त खोलने से डर लगता है

मेरी मायूस सूरत देखकर वो भी मायूस हो जाया करती हैं,
तेरे ख़त भी इन दिनों, तुझसे ज्यादा मेरी क़दर किया करती हैं,
ज़माना जानता है मेरे दिल में क्या है,
मगर उस इश्क को, इश्क बोलने से डर लगता है.
धडकनें आज़ाद न हो जाएँ, ख़त खोलने से डर लगता है

हाँ... दिल को तसल्ली देने के लिए,
“यही सही था” बोल दिया करता हूँ कभी,
याद तेरी आती है तो दो कदम रुक जाया करता हूँ तभी...
सुना था के तीस के बाद तकमील आ जाया करती है
मगर इस कम-ज़र्फ़ दिल को हर बार टटोलने से डर लगता है....
वो चंद लिफाफों में आज भी मोहब्बत क़ैद हैं मेरी,
धडकनें आज़ाद न हो जाएँ, ख़त खोलने से डर लगता है